Bharat ka Bhautik Swaroop भारत का भौतिक स्वरूप
Notes
भारत का भौतिक स्वरूप
❖ भारत विभिन्न स्थलाकृतियों वाला एक विशाल देश है।
❖ हमारे देश में हर प्रकार की भू-आकृतियाँ पायी जाती हैं, जैसे पर्वत, मैदान, मरुस्थल, पठार तथा द्वीप समूह।
❖ हिमालय एवं उत्तरी मैदान हाल में बनी स्थलाकृतियाँ हैं।
❖ उत्तरी मैदान जलोढ़ निक्षेपों से बने हैं।
प्रायद्वीपीय पठार आग्नेय तथा रूपांतरित शैलों वाली कम ऊँची पहाड़ियों एवं चौड़ी घाटियों से बना है।
मुख्य भौगोलिक वितरण
❖ NCERT के अनुसार भारत की भौगोलिक आकृतियों को 6 वर्गों में विभाजित किया गया है सामान्यत: चार वर्गों में विभाजित करते है -
(1) हिमालय पर्वत श्रृंखला
(2) उत्तरी मैदान
(3) प्रायद्वीपीय पठार
(4) भारतीय मरुस्थल
(5) तटीय मैदान
(6) द्वीप समूह
हिमालय पर्वत श्रृंखला
❖ हिमालय के उत्तर में तीन पर्वत श्रेणियाँ है –
· काराकोरम
· लद्दाख
· जास्कर
❖ भारत की उत्तरी सीमा पर विस्तृत हिमालय भूगर्भीय रूप से युवा है ।
❖ बनावट के दृष्टिकोण से वलित पर्वत श्रृंखला है।
❖ ये पर्वत श्रृंखलाएँ पश्चिम-पूर्व दिशा में सिंधू से लेकर ब्रह्मपुत्र तक फैली हैं।
❖ ये 2,400 किमी की लंबाई में फैले एक अर्द्धवृत्त का निर्माण करते हैं।
❖ इसकी चौडाई कश्मीर में 400 कि॰मी॰ एवं अरुणाचल में 150 कि॰मी॰ है।
❖ पश्चिमी भाग की अपेक्षा पूर्वी भाग की ऊँचाई में अधिक विविधता पाई जाती है।
❖ अपने पूरे देशांतरीय विस्तार के साथ हिमालय को तीन भागों में बाँटा गया है ।
1.महान या आंतरिक हिमालय या हिमाद्रि हिमालय
❖ सबसे उत्तरी भाग में स्थित श्रृंखला को महान या आंतरिक हिमालय या हिमाद्रि कहते हैं।
❖ यह सबसे अधिक सतत् श्रृंखला है.
❖ इसकी औसत ऊंचाई 6.000 मीटर हैं।
❖ इसमें हिमालय के सभी मुख्य शिखर हैं।
❖ महान हिमालय की प्रमुख चोटियाँ –
जम्मू कश्मीर में –
❖ नंगा पर्वत
❖ मासेर ब्रम
❖ गासेर ब्रम
उत्तराखंड में -
❖ कामेट पर्वत
❖ नंदा देवी
सिक्किम में –
❖ कंचन जंघा (भारत में हिमालय की सबसे ऊँची चोटी)
अरुणाचल प्रदेश –
❖ नामचा बरवा
नेपाल में –
❖ माउंट एवरेस्ट
❖ मकालू
❖ धौलागिरि
❖अन्नपूर्णा
❖ गौरी शंकर
❖ हिमालय के इस भाग का क्रोड ग्रेनाइट का बना है।
❖ यह श्रृंखला हमेशा बर्फ से ढँकी रहती है तथा इससे बहुत-सी हिमानियों का प्रवाह होता है।
2.हिमाचल या निम्न हिमाचल / मध्य हिमालय/ लघु हिमालय
❖ हिमाद्रि के दक्षिण में स्थित श्रृंखला सबसे अधिक असम है।
❖ इन श्रृंखलाओं का निर्माण मुख्यतः अत्याधिक संपीडित तथा परिवर्तित शैलों से हुआ हैं।
❖ इनकी औसत ऊँचाई 3.700 मीटर से 4.500 मीटर तक
❖ औसत चौडाई 50 किलोमीटर
❖ पीर पंजाल श्रृंखला सबसे लंबी तथा सबसे महत्त्वपूर्ण श्रृंखला है।
❖ धौलाधर एवं महाभारत श्रृंखलाएँ भी अन्य महत्त्वपूर्ण हैं।
❖ इस श्रृंखला में कश्मीर की घाटी तथा हिमाचल के कांगड़ा एवं कुल्लू की घाटियाँ स्थित हैं।
❖ कश्मीर घाटी महान हिमालय और महाभारत के मध्य स्थित है ।
❖ निम्न हिमालय के निचली ढालों पर घास के मैदान पाए जाते है जिन्हे कश्मीर में मर्ग ( गुलमर्ग , सोनमर्ग,खिलनमर्ग) तथा उतराखंड में बुग्याल या पयार कहा जाता है ।
❖ शिमला , मंसूरी , नैनीताल ,कांठमाडु और दार्जिलिंग इसी में स्थित है ।
❖ इस क्षेत्र को पहाड़ी नगरों के लिए जाना जाता है।
3. शिवालिक हिमालय /बाह्य हिमालय
❖ औसत ऊँचाई 900 से 1.100 मीटर के बीच
❖ चौड़ाई 10 से 50 कि॰मी॰
❖ ये श्रृंखलाएँ, उत्तर में स्थित मुख्य हिमालय की श्रृंखलाओं से नदियों द्वारा लायी गयी असंपिडित अवसादों से बनी है।
❖ ये घाटियाँ बजरी तथा जलोढ़ की मोटी परत से ढँकी हुई हैं।
❖ निम्न हिमाचल तथा शिवालिक के बीच में स्थित लंबवत् घाटी को दून के नाम से जाना जाता है।
❖ कुछ प्रसिद्ध दून हैं- देहरादून, कोटलीदून एवं पाटलीदून।
❖ इस उत्तर-दक्षिण के अतिरिक्त हिमालय को पश्चिम से पूर्व तक स्थित क्षेत्रों के आधार पर भी विभाजित किया गया है।
❖ इन वर्गीकरणों को नदी घाटियों की सीमाओं के आधार पर किया गया है।
❖ सिंधु एवं सतलुज के बीच स्थित हिमालय के भाग को पंजाब हिमालय /कश्मीर / हिमाचल हिमालय
❖ सतलुज तथा काली नदियों के बीच स्थित हिमालय के भाग को कुमाँऊ हिमालय
❖ काली तथा तिस्ता नदियाँ के बीच हिमालय के भाग को नेपाल हिमालय
❖ तिस्ता तथा दिहांग नदियाँ के बीच हिमालय के भाग को असम हिमालय
❖ ब्रह्मपुत्र हिमालय की सबसे पूर्वी सीमा बनाती है।
❖ दिहांग महाखड्ड (गार्ज) के बाद हिमालय दक्षिण की ओर एक तीखा मोड़ बनाते हुए भारत की पूर्वी सीमा के साथ फैल जाता है।
❖ इन्हें पूर्वाचल या पूर्वी पहाड़ियों तथा पर्वत श्रृंखलाओं के नाम से जाना जाता है।
❖ ये पहाड़ियाँ उत्तर-पूर्वी राज्यों से होकर गुजरती हैं
❖पूर्वाचल में पटकाई, नागा, मिजो तथा मणिपुर पहाड़ियाँ स्थित है
(2) उत्तरी मैदान
❖ सिंधु, गंगा एवं ब्रह्मपुत्र तथा इनकी सहायक नदियों से बना।
❖ यह मैदान जलोढ़ मृदा से बना है।
❖ इसका विस्तार 7 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर है।
❖ यह मैदान लगभग 2,400 किमी लंबा एवं 240 से 320 किमी चौड़ा है।
❖ यह सघन जनसंख्या वाला भौगोलिक क्षेत्र है।
❖पानी की उपलब्धता एवं अनुकूल जलवायु के कारण कृषि की दृष्टि से यह भारत का अत्यधिक उत्पादक क्षेत्र है।
❖ नदी के निचले भागों में ढाल कम होने के कारण नदी की गति कम हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप नदीय द्वीपों का निर्माण होता है।
❖ उत्तरी मैदान का सबसे विशालतम भाग पुराने जलोढ़ का बना है।
❖ उत्तरी मैदान को तीन उपवर्गों में विभाजित
❖ उत्तरी मैदान के पश्चिमी भाग को पंजाब का मैदान कहा जाता है।
❖ सिंधु तथा इसकी सहायक नदियों के द्वारा बनाये गए इस मैदान का बहुत बड़ा भाग पाकिस्तान में स्थित है।
❖ सिंधु तथा इसकी सहायक नदियाँ झेलम, चेनाब, रावी, ब्यास तथा सतलुज हिमालय से निकलती हैं।
❖ मैदान के इस भाग में दोआबों की संख्या बहुत अधिक है।
❖ गंगा के मैदान का विस्तार घघ्घर तथा तिस्ता नदियों के बीच है।
❖ यह उत्तरी भारत में हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के कुछ भाग तथा पश्चिम बंगाल में फैला है।
❖ ब्रह्मपुत्र का मैदान असम में स्थित है।
❖ नदियाँ पर्वतों से नीचे उतरते समय शिवालिक की ढाल पर 8 से 16 कि॰मी॰ के चौड़ी पट्टी में गुटिका का निक्षेपण करती हैं। इसे 'भाबर' के नाम से जाना जाता है।
❖ सभी नदियां इस भाबर पट्टी में विलुप्त हो जाती हैं।
❖ इस पट्टी के दक्षिण में ये नदियाँ पुनः निकलती है एवं नम तथा दलदली क्षेत्र का निर्माण करती हैं, जिसे 'तराई' कहा जाता है।
❖ उत्तरी मैदान का सबसे विशालतम भाग पुराने जलोढ़ का बना है। वे नदियों के बाढ़ वाले मैदान के ऊपर स्थित हैं तथा वेदिका जैसी आकृति प्रदर्शित करते हैं। इस भाग को 'भांगर' या बांगर के नाम से जाना जाता है।
❖ इस क्षेत्र की मृदा में चूनेदार निक्षेप पाए जाते हैं. जिसे स्थानीय भाषा में 'कंकड़' कहा जाता है।
❖ बाढ़ वाले मैदानों के नये तथा युवा निक्षेपों को 'खादर' कहा जाता है।
प्रायद्वीपीय पठार
❖ प्रायद्वीपीय पठार एक मेज की आकृति वाला स्थल है जो पुराने क्रिस्टलीय, आग्नेय तथा रूपांतरित शैलों से बना है।
❖ यह गोंडवाना भूमि के टूटने एवं अपवाह के कारण बना ।
❖ यह प्राचीनतम भूभाग का एक हिस्सा है।
❖ इस पठारी भाग में चौड़ी तथा छिछली घाटियाँ एवं गोलाकार पहाड़ियाँ हैं।
❖ इस पठार के दो मुख्य भाग हैं- 'मध्य उच्चभूमि' तथा 'दक्कन का पठार'।
❖ नर्मदा नदी के उत्तर में प्रायद्वीपीय पठार भाग मध्य उच्चभूमि के नाम से जाना जाता है जो कि मालवा के पठार के अधिकतर भागों में फैला हुआ है ।
❖ विंध्य शृंखला दक्षिण में सतपुड़ा श्रृंखला तथा उत्तर-पश्चिम मे अरावली पर्वतमाला से घिरी हुई
❖ इस क्षेत्र में बहने वाली नदियाँ, चंबल, सिंध, बेतवा तथा केन दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की तरफ बहती हैं।
❖ मध्य उच्चभूमि पश्चिम में चौड़ी लेकिन पूर्व में संकीर्ण है।
❖ इस पठार के पूर्वी विस्तार को स्थानीय रूप से बुंदेलखंड तथा बघेलखंड के नाम से जाना जाता है।
❖ इसके और पूर्व के विस्तार को दामोदर नदी द्वारा अपवाहित छोटा नागपुर पठार दर्शाता है।
❖ दक्षिण का पठार एक त्रिभुजाकार भूभाग है. जो नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित है।
❖ उत्तर में इसके चौड़े आधार पर सतपुड़ा की श्रृंखला है.
❖ पूर्व में महादेव, कैमूर की पहाड़ी तथा मैकाल श्रृंखला
❖ दक्षिण का पठार पश्चिम में ऊँचा एवं पूर्व की ओर कम ढाल वाला है।
❖ इस पठार का एक भाग उत्तर-पूर्व में भी है. जिसे स्थानीय रूप से 'मेघालय', 'कार्बी एंगलौंग पठार' तथा 'उत्तर कचार पहाड़ी' के नाम से जाना जाता है।
❖ यह एक भ्रंश के द्वारा छोटा नागपुर पठार से अलग हो गया है।
❖ पश्चिम से पूर्व की ओर तीन महत्त्वपूर्ण श्रृंखलाएँ गारो, खासी तथा जयंतिया हैं।
❖ दक्षिण के पठार के पूर्वी एवं पश्चिमी सिरे पर क्रमशः पूर्वी तथा पश्चिमी घाट स्थित हैं।
❖ पश्चिमी घाट, पश्चिमी तट के समानांतर स्थित है। वे सतत् हैं तथा उन्हें केवल दरों के द्वारा ही पार किया जा सकता है।
❖ पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट की अपेक्षा ऊँचे हैं।
❖ पूर्वी घाट के 600 मीटर की औसत ऊँचाई की तुलना में पश्चिमी घाट की ऊँचाई 900 से 1.600 मीटर है।
❖ पूर्वी घाट का विस्तार महानदी घाटी से दक्षिण में नीलगिरी तक है।
❖ पूर्वी घाट एवं पश्चिमी घाट का मिलन स्थल नीलगिरी है ।
❖ पूर्वी घाट का विस्तार सतत् नहीं है। ये अनियमित हैं एवं बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियों ने इनको काट दिया है।
❖ पश्चिमी घाट में पर्वतीय वर्षा होती
❖ पश्चिमी घाट की ऊँचाई. उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती जाती है।
❖ इस भाग के शिखर ऊँचे हैं, जैसे अनाई मुडी (2.695 मी) तथा डोडा बेटा (2.633 मी०)।
❖ पूर्वी घाट का सबसे ऊँचा शिखर महेंद्रगिरी (1,501 मी०) है।
❖ पूर्वी घाट के दक्षिण-पश्चिम में शेवराय तथा जावेडी की पहाड़ियाँ स्थित हैं।
❖ उड्गमंडलम्, जिसे ऊटी के नाम से जाना जाता है तथा कोडईकनाल जैसे प्रसिद्ध पहाड़ी
❖ प्रायद्वीपीय पठार की काली मृदा है, जिसे 'दक्कन ट्रैप' के नाम से भी जाना जाता है।
❖ इसकी उत्पत्ति ज्वालामुखी से हुई है, इसलिए इसके शैल आग्नेय हैं।
भारतीय मरुस्थल
❖ अरावली पहाड़ी के पश्चिमी किनारे थार का मरुस्थल स्थित है।
❖ इस क्षेत्र में प्रति वर्ष 150 मिमी से भी कम वर्षा होती है।
❖ इस शुष्क जलवायु वाले क्षेत्र में वनस्पति बहुत कम है।
❖ 'लूनी' ही इस क्षेत्र की सबसे बड़ी नदी है।
❖ बरकान (अर्धचंद्राकार बालू का टीला) का विस्तार बहुत अधिक क्षेत्र पर होता है।
तटीय मैदान
❖ यह प्रायद्वीपीय पठार के किनारों संकीर्ण तटीय पट्टीयों का विस्तार है।
❖ यह पश्चिम में अरब सागर से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक विस्तृत है।
❖ पश्चिमी तट, पश्चिमी घाट तथा अरब सागर के बीच स्थित एक संकीर्ण मैदान है।
इस मैदान के तीन भाग हैं।
❖ तट के उत्तरी भाग को कोंकण (मुंबई तथा गोवा),
❖ मध्य भाग को कन्नड मैदान
❖ दक्षिणी भाग को मालाबार तट
❖ पूर्वी तट बंगाल की खाड़ी के साथ विस्तृत मैदान चौड़ा एवं समतल है।
❖ उत्तरी भाग में इसे 'उत्तरी सरकार' कहा जाता है।
❖ दक्षिणी भाग 'कोरोमंडल' तट के नाम से जाना जाता है।
❖ बड़ी नदियाँ, जैसे महानदी, गोदावरी. कृष्णा तथा कावेरी इस तट पर विशाल डेल्टा का निर्माण करती हैं।
❖ चिल्का झील पूर्वी (ओड़ीसा ) तट पर स्थित एक महत्त्वपूर्ण भू-लक्षण है।
द्वीप समूह
❖ केरल के मालाबार तट के पास स्थित लक्षद्वीप की स्थित है जो यह समूह छोटे प्रवाल द्वीपों से बना है।
❖ पहले इनको लकादीव, मीनीकाय तथा एमीनदीव के नाम से जाना जाता था।
❖ 1973 में इनका नाम लक्षद्वीप रखा गया।
❖ यह 32 वर्ग किमी के छोटे से क्षेत्र में फैला है।
❖ कावारत्ती द्वीप लक्षद्वीप का प्रशासनिक मुख्यालय है।
❖ इस द्वीप समूह पर पादप तथा जंतु के बहुत से प्रकार पाए जाते हैं।
❖ पिटली द्वीप, जहाँ मनुष्य का निवास नहीं है, वहाँ एक पक्षी अभयारण्य है।
❖ अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह आकार में बड़े संख्या में है ।
❖ यह द्वीप समूह मुख्यतः दो भागों में बाँटा गया है उत्तर में अंडमान तथा दक्षिण में निकोबार।
❖ यह माना जाता है कि यह द्वीप समूह निमज्जित पर्वत श्रेणियों के शिखर हैं
❖ यह द्वीप समूह देश की सुरक्षा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है ।
